हिंदी के कद्दावर संपादक डॉ सुभाष राय और प्रखर युवा पत्रकार हरे प्रकाश उपाध्याय के संयुक्त प्रयास से एक ऐसी मासिक पत्रिका का प्रकाशन लखनऊ से प्रारंभ होने जा रहा है जो समकालीन स्वर को केवल धार ही न देगी, अपितु समय की शीला पर एक अमिट छाप छोड़ते हुए समाज में अपनी सार्थक उपस्थिति दर्ज कराने में सफल होगी, ऐसी प्रतिबद्धता संपादक के वक्तव्य से महसूस किया जा सकता है । प्रस्तुत है डॉ सुभाष राय जी और श्री हरे प्रकाश जी के
अवधारणा-पत्र का महत्वपूर्ण अंश :
आदऱणीय साथी,

वे कुछ ऐसा चमत्कार करने की कोशिश में हैं कि ज्यादा से ज्यादा लाभ के हालात बने। यह कमाई पाठकों के अखबार खरीदने से नहीं हो सकती, यह तो केवल और केवल विज्ञापन से हो सकती है। परंतु विज्ञापन आए, इसके लिए पाठकों की तादाद ज्यादा से ज्यादा होनी चाहिए। जाहिर है वे अपना सर्कुलेशन बढ़ाना तो चाहते हैं लेकिन इसलिए नहीं कि उन्हें हिंदी की या पाठकों की बहुत चिंता है बल्कि इसलिए कि वे अधिकतम विज्ञापन समेटना चाहते हैं। पाठक संख्या बढ़ाने के तमाम खेल हैं, उसका अखबारों की सामग्री और पाठकों की पसंद से कोई वास्ता नहीं। इस होड़ में पिछले कुछ वर्षों में समाचारपत्रों ने न केवल अपने मूल्य ( नैतिक व आर्थिक दोनों स्तरों पर) बेतरह घटाये हैं, बल्कि तमाम तरह के इनामों के लालच भी पाठकों को देने शुरू कर दिये हैं। वे पाठक को अब पाठक नहीं ग्राहक समझते हैं और उसे मूर्ख बनाकर या ललचाकर खरीद लेना चाहते हैं।
मीडिया के जरिये पूंजीवादी ताकतें खतरनाक षड्यंत्रकारी भूमिका भी निभा रही हैं। अखबारों में ऐसी खबरें या टिप्पणियाँ बहुत कम नजर आती हैं, जो जनता को जगा सकें, जनचेतना को धारदार बना सकें। एक तरफ सत्ता और पूंजीवादी साम्राज्यवाद के खिलाफ जाने वाली ज्यादातर सूचनाओं को दबाने की कोशिशें की जा रहीं हैं, तो दूसरी ओर नाच-गाने, मौज-मस्ती, माल-टाल की चकाचौंध में उलझाकर आदमी को निष्क्रिय और निस्तेज बनाने का अभियान चलाया जा रहा है। मीडिया प्रतिपक्ष की अपनी भूमिका भूलकर सत्ता प्रतिष्ठानों के आगे दुम हिलाता दिखाई पडता है।
व्यवसाय कोई बुरी चीज नहीं है, विज्ञापन भी अपना सूचनात्मक महत्व रखता है, समाज को उसकी भी जरूरत हो सकती है, लेकिन इन्हें लूट, धोखा और झूठ की सीमा तक नहीं जाना चाहिए। कहना न होगा कि विज्ञापनों की दुनिया में फरेब भरा पड़ा है। मीडिया को इसकी चिंता ज्यादा है, अपने पाठकों की कम। यह अधूरा सच होगा, अगर कहा जाय कि पाठक अखबारों की सामग्री से संतुष्ट है, उसे किसी और चीज की तलाश नहीं है। पिछले दो सालों में मुझे एक बिल्कुल नया अनुभव हुआ कि अखबारों ने साहित्य, कला और संस्कृति की दुनिया को जिस तरह व्यवसाय की दृष्टि से प्रतिगामी मानकर त्याग दिया है, ज्वलंत सामाजिक और राष्ट्रीय मुद्दों पर गंभीर बातचीत के लिए मंच उपलब्ध कराने को फिजूल मानकर पल्ला झाड़ लिया है, वह उनके प्रतिकूल गई है। इन सामग्रियों के पाठकों की कमी नहीं है। लोग ऐसी सामग्री चाहते हैं। इस जरूरत को तमाम लघु पत्रिकाएं पूरा कर रही हैं।
हिंदी समेत सभी भाषाओं में अनेक ऐसी पत्रिकाएं हैं, जो कविता, कहानी, संस्मरण, नाटक, समीक्षा और कला के अन्य रचनात्मक आयामों को प्रस्तुत करती रहती हैं, उन पर बात भी करती रहती हैं। राजनीति हमारे जीवन की नियंता बनी हुई है। उस पर बात होनी ही चाहिए, उसके दांव-पेच पर बात करने वाली पत्रिकाओं की भी कमी नहीं है। ऐसी पत्रिकाएं चटनी की तरह साहित्य और कला पर भी थोड़ी-मोड़ी सामग्री परोसती रहती हैं।

हमें नहीं मालूम वह कैसे बनेगा, पर न जाने क्यों एक भरोसा है कि बनेगा, जरूर बनेगा। यह भरोसा क्यों है, मैं यह भी नहीं जानता। हो सकता है आपके ही प्रयास से बात बन जाए। बिना आप की मदद के यह काम पूरा नहीं हो सकता। लेखकीय योगदान की अपेक्षा के साथ ही आप सभी मित्रों से, इसे पाने वाले, पढ़ने वाले हर किसी से मेरा आग्रह है कि हमारा भरोसा टूटने न दें। अगर कोई इसे प्रायोजित करना चाहता है या इस योजना में कोई सहभाग करना चाहता है तो वह हम लोगों से संपर्क कर सकता है।
() सुभाष राय ( मोबाइलः 09455081894)
() हरे प्रकाश उपाध्याय ( मोबाइलः 08756219902)
1 टिप्पणियाँ:
मेरी हार्दिक शुभकामनायें स्वीकार करें !
मेरा रंग दे बसंती चोला - ब्लॉग बुलेटिन आज की ब्लॉग बुलेटिन मे शामिल है आपकी यह पोस्ट भी ... पाठक आपकी पोस्टों तक पहुंचें और आप उनकी पोस्टों तक, यही उद्देश्य है हमारा, उम्मीद है आपको निराशा नहीं होगी, टिप्पणी मे दिये लिंक पर क्लिक करें और देखें … धन्यवाद !
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